- बिलासपुर। इमलीपारा कॉम्प्लेक्स की नवनिर्मित 55 दुकानों का ताला किसके नाम से खुलेगा, इसका फैसला अभी हुआ नहीं है। नगर निगम आयुक्त द्वारा गठित सात सदस्यीय कमेटी ने अपनी रिपोर्ट तक आयुक्त या कलेक्टर को नहीं सौंपी है। इसके बाद भी दुकानों के आवंटन को लेकर बयानबाजी और दावों का दौर शुरू हो गया है। यही स्थिति अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आ रही है—जब फैसला बाकी है, तो नतीजे की तस्वीर पहले से कैसे बनने लगी?
इमलीपारा कॉम्प्लेक्स में कुल 65 दुकानें हैं। इनमें से पहली निविदा के जरिए 10 दुकानें किराए पर दी जा चुकी हैं। शेष 55 दुकानों को लेकर प्रक्रिया जारी है। इन दुकानों पर पूर्व में काबिज रहे करीब 75 दुकानदारों और चबूतरा धारियों के दावों को देखते हुए नगर निगम आयुक्त प्रकाश सर्वे ने सात सदस्यीय कमेटी गठित की है।

कमेटी का काम संबंधित दावेदारों के दस्तावेज, पूर्व की स्थिति और दावों की वैधता का परीक्षण कर रिपोर्ट तैयार करना है। इसके बाद आयुक्त/कलेक्टर स्तर पर निर्णय और आगे शासन की स्वीकृति की प्रक्रिया होनी है। यानी फिलहाल दुकान आवंटन का अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
रिपोर्ट से पहले ही माहौल क्यों गरम?
पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि जब कमेटी अभी दस्तावेजों की जांच कर रही है और उसकी रिपोर्ट प्रशासन के सामने आनी बाकी है, तब संभावित आवंटन को लेकर चर्चाएं और बयानबाजी क्यों तेज हो गई?
दुकानदारों के बीच इसे लेकर संशय की स्थिति है। किसी को पात्रता की उम्मीद है तो किसी को अपना दावा खारिज होने की आशंका। ऐसे में कमेटी की रिपोर्ट आने से पहले ही यदि किसी दावेदार के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनने लगे, तो स्वाभाविक तौर पर पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठेंगे।

हाईकोर्ट के आदेश और चबूतरा धारियों के दावे
मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के विभिन्न आदेशों का हवाला भी दिया जा रहा है। विशेष रूप से सुशील समनानी (चबूतरा) प्रकरण में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा लीज के आधार पर दुकान देने के आदेश का दावा सामने आ रहा है।
बताया जा रहा है कि करीब 20 से 25 चबूतरा धारियों के पास लीज से संबंधित दस्तावेज होने का दावा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि इन दस्तावेजों और न्यायालयीन आदेशों का परीक्षण किस आधार पर होगा? क्या सभी दावों को समान कसौटी पर परखा जाएगा? और क्या कमेटी की रिपोर्ट तैयार करते समय संबंधित न्यायालयीन आदेशों को पूरी तरह ध्यान में रखा जाएगा?
इन सवालों का जवाब कमेटी की रिपोर्ट और उसके बाद प्रशासनिक निर्णय से ही सामने आएगा।
तीन साल की कानूनी लड़ाई… फिर वही कहानी तो नहीं?
दुकानदारों का कहना है कि इमलीपारा का विवाद पहले भी न्यायालय की चौखट तक पहुंच चुका है। संबंधित पक्षों को लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी और करीब तीन साल तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने की स्थिति बनी।
ऐसे में इस बार दुकानदार जल्दबाजी के बजाय दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच, न्यायालयीन आदेशों के परीक्षण और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि पात्रता और आवंटन को लेकर किसी तरह की जल्दबाजी हुई या महत्वपूर्ण दावों की अनदेखी हुई, तो विवाद दोबारा न्यायालय तक पहुंच सकता है।
55 दुकानों का फैसला… लेकिन सवाल कई
फिलहाल इमलीपारा की 55 दुकानों पर किसी का अंतिम कब्जा नहीं है। असली तस्वीर सात सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही साफ होगी। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर निर्णय और शासन की स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी होनी है।
लेकिन उससे पहले ही उठती बयानबाजी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या कमेटी की रिपोर्ट आने से पहले ही आवंटन की दिशा तय होने लगी है? क्या पुराने दुकानदारों और चबूतरा धारियों के सभी दावों का निष्पक्ष परीक्षण होगा? क्या लीज से जुड़े न्यायालयीन आदेशों को आवंटन में पूरी तरह लागू किया जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल, अगर फैसला अभी बाकी है, तो इमलीपारा की 55 दुकानों को लेकर इतनी जल्दी माहौल क्यों बनने लगा?
फिलहाल निगाहें सात सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी हैं। यही रिपोर्ट तय करेगी कि 55 दुकानों की दौड़ में कौन पात्र ठहरता है और किसका दावा खारिज होता है। तब तक इमलीपारा की दुकानों पर ताले जरूर लगे हैं, लेकिन इन तालों की चाबी किसके हाथ जाएगी—इसका फैसला अभी बाकी है।

